
अपनी सोच से ही इन्सान कैद होता है और अपनी सोच से ही रिहा। हमारी सोच ही हमे बंदी बनाती है और हमारी सोच ही हमे मुक्त करने की भी क्षमता रखती है। हमारी सोच से ही हमारा जीवन बनता या बिगड़ता है।
प्रभु पथ का प्रथम चरण है स्व परिवर्तन। प्रभु पथ का चरम है स्वःमिलन, आत्मा और परमात्मा का मेल ही इस पथ का लक्ष्य है, शिखर है।
हम जब अपना भाग्य भगवान से भाग कर लेते हैं तब हमारे सभी दुखों व दर्दों का भी विभाग हो जाता है, सभी पीड़ा व सभी कष्ट आधे-आधे भगवान से बंट जाते हैं और फिर हम स्वयं को विमुक्त व स्वतंत्र पाते हैं।
एक बार प्रभु से प्रीत की डोर जब बंध जाती है तब हर तृष्णा तृप्त हो जाती है और कोई भी प्यास शेष न रह जाती है। और जैसे-जैसे यह डोर प्रगाढ़ होती चली जाती है वैसे-वैसे हमारे सभी डर, भय व चिंताओं का भी नाश होने लग जाता है। प्रभु प्रेम के आरंभ मे ही सभी दुखों का अंत है।
सांसें दिखती नहीं, मगर जब यह सांसे हमारे शरीर में नहीं होतीं तब हम जीवित ही नहीं होते।
आत्मा का कोई रूप नहीं आकार नहीं लेकिन इसी शक्ति से हम हैं, हमारा अस्तित्व है और यह सम्पूर्ण संसार व जगत है।
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