दीप-प्रदीप

हमारे अपने ही कर्मों का लेखा-जोखा है जो हमारा भाग्य बन कर हमारे सामने आता है।यही हिसाब-किताब पूरा करने के लिए हमे यह जीवन मिला है। हम अक्सर भगवान को ही अपने दुख-दर्द का दोषी मान लेते हैं। यह भ्रम हमारी अज्ञानता ही है! ईश्वर तो हमारे परम पिता हैं। हमारे सुख-दुख के सच्चे साथी। और कभी ध्यान से देखा जाए व सोचा जाए तो हम पाएंगे की, हर परिस्थिति, विकट से विकट कठिनाई में, हर पल, हर क्षण, वे ही हैं जो हमारी सहायता करते हैं व हर विपदा में हमारी रक्षा करते हैं। कोई हो या न हो, प्रभु तो हमेशा ही हमारे साथ होते हैं। ईश्वर तो दया का सागर हैं।

हृदय में विराजमान ईश्वर की अराधना में हम अपनी आत्मा का दीपक जलाएंगे, मन की आहूति चढ़ाएंगे, बुद्धी को समर्पित करेंगे व श्रद्धा के फ़ूल अर्पित कर अपना जीवन सफल बनाएंगे और अन्यों को शांति व करूणा का प्रसाद खिलाएंगे।

हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य है, ईश्वर मिलन। यह सौभाग्य सम्पूर्ण जगत व समस्त प्राणियों में सिर्फ मनुष्यों को ही प्राप्त है। इस अवसर को हमे कतई नहीं गंवाना चाहिए। जब मन में सच्ची लगन जागेगी तब ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग ईश्वर हमे स्वयं ही दिखाएंगे। किसी को ज्ञानी जनों का सानिध्य प्राप्त होगा तो किसी को जीवन ही शिक्षक बन प्रभु तक पहुंचाएगा।

जीवन की कश्मकश में सदा ही जब हम संसार के शोर-ओ-गुल से दूर हो के एकांत में अपने मन की आवाज़ सुन के उसी पथ पर आगे कदम बढ़ाते हैं तब हम मंज़िल को अपने पास ही पाते हैं। मन की आवाज़, ईश्वर का ही आह्वान होती है। इसे कभी भी अनसुना नहीं करना चाहिए। यही सच्चा मार्ग है और इसी पथ पर चल के हम भगवान के समीप पहुंचते चले जाते हैं, प्रति क्षण प्रभु की उपस्थिति का अद्भुत अनुभव करते हैं और हमारा जीवन शांति और सन्तोष का एक प्रतीक बन जाता है।

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