
सफर शुरु हुआ है तो मंज़िल भी ज़रूर मिलेगी, हाँ मगर इस में दिन भी ढलेगा और कभी सायों की खामोशियां भी मिलेगी, ऐसी घटाएं तो सफर में बरसती ही रहेगी, यह हवाएं तो यूंही हरदम चलती ही चलेगी, पर मंज़िल की डोर हम से मज़बूती से बंधी रहेगी, और एक रोज़ फिर दोबारा धूप भी ज़रूर खिलेगी।
सफर में भले ही हो हर ओर घनेरे जंगल या कितने ही गहरे क्यों न हो यह समंदर, हौसले और हिम्मत से टिकी है मंज़िल पर हमारी नज़र, तूफानों से घिरे हों या जा टकराएं ऊंचे पहाड़ों पर, इन्हीं राहों पर चलते रहेंगे हम यूंही निडर और निरंतर, और एक न एक दिन पा ही लेंगे हम अपनी मंज़िल और ज़रूर ही देखेंगे अपने ख्वाबों का वह सुहाना मंज़र।
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