
कहते हैं सत्य कड़वा होता है, लेकिन सिर्फ तब तक, जब तक हम उसे स्वीकार नहीं कर लेते, और जब यही सत्य हम अपना लेते हैं तब वही अमृत से भी ज़्यादा मीठा बन जाता है। सत्य स्वीकार कर लेने से अंतर्द्वद्व समाप्त होता है, अन्यों से जूझना व आपसी भिड़ंत से छुटकारा मिलता है, परिस्थिति साफ और स्पष्ट दिखने से समाधान की ओर चल पड़ते हैं, अन्यों की तो पहचान होती ही है खुद से खुद के साक्षात्कार का आरंभ होता है, स्थिती कम पीड़ादायक बन जाती है , साथ ही साथ सत्य स्वीकार कर लेने से आंतरिक व बाहरी शांति का संचार होने लगता है। हर सत्य उस परम सत्य की ही छवि होती है, इसीलिए, हम जब-जब झूठ, गलत, माया, मिथ्या डर,भय से दूर होते चले जाते हैं तब-तब हम उस परम सत्य के पास पहुंचते जाते हैं। जैसे-जैसे हम हर सत्य को स्वीकारते हैं वैसे-वैसे ही वे परम सत्य भी हमे स्वीकारते चले जाते हैं। सत्य को जीना ही सही मायने मे सत्य की सच्ची अराधना है।
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