
ईश्वर तो निराकार हैं। श्रेष्ठ चढ़ावा भी उन पे फिर निराकार ही होना चाहिए। जैसे, हमारी प्रभु पर अडिग आस्था, कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन पर हमारा अटल विश्वास, घोर उदासी और नउम्मीदी के दौर में भी भगवान पर हमारी असीम श्रद्धा। खुशी, उत्सव व पर्व के अवसर में प्रभु के प्रति हमारे हृदय में सच्चा आभार और कृतज्ञता।
हाँ मगर, भौतिक दान-दक्षिणा की भी अपनी एहमियत है और इसके महत्व को कतई नकारा नहीं जा सकता है। यह भी उत्तम कोटी का चढ़ावा बन जाता है जब हम इनके साधन से अभावग्रस्त जनों की सहायता करते हैं। उनकी सेवा ही प्रभु की सेवा बन जाती है। हम जब अपना समय, सहानुभूति, वस्तु,धन राशी या फिर अन्य किसी भी वांछित मार्ग से जरूरतमंदों की सहायता करते हैं तब हम प्रभु का दिया ही प्रभु को अर्पित करते हैं। इसी योगदान में हमारा प्रसाद भी निहित है। ऐसे निस्वार्थ दान-प्रदान से हम स्थाई संतोष व शांति का अनुभव करते हैं, साथ ही साथ व्यथित आत्माओं की दुआओं से हमारी झोली भर जाती है और तो और हम ईश्वरीय अनुकम्पा व आशीर्वाद के योग्य पात्र भी बन जाते हैं। ऐसी साझेदारी और सहयोग ही ईश्वर के चरणों में हमारी सर्वोच्च और सर्वोत्तम भेंट बन जाती है।
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