
दूसरों से हटा के अपना ध्यान स्वयं पर केंद्रित करें। कुछ नया सीखें, किसी बुरी आदत को छोड़ें, कोई नई व अच्छी आदत को अपनाएं। एक नवीन संकल्प लें। इसकी धारना और साधना में अपनी उर्जा को अर्जित करें। कोई भी सब कुछ नहीं कर सकता, इसलिए, किसी एक ऐसे सतगुण को अपनाए व उसका अभ्यास करें जो आपके लिए उचित व उपयोगी साबित हो। ऐसा करने से हमारी शक्ति सही दिशा में विकसित होगी, मन का भटकाव कम होगा और एकाग्रता बढ़ेगी साथ ही साथ जीवन में सकारात्मक बदलाव आने शुर हो जाएंगे।
मैं, मेरा और मैंने को जब हम आवश्यकता से अधिक महत्व देने लगते हैं तब हम अपना ही नुकसान कर बैठते हैं। यह आदत एक ऐसे विष के समान है जो हमे ही अन्दर से खोखला बना देती है। इससे हम मजबूत तो नहीं कमज़ोर ज़रूर होते चले जाते हैं। हम जब दूसरों को मान्यता देते हैं ,उनकी सराहना करते हैं या उचित श्रेय देते हैं तब हम स्वयं भी प्रसन्नता का पुरस्कार पाते हैं। किसी का उदार मन से आदर करने से हम स्वयं भी आदर के योग्य बन जाते हैं।
कभी किसी की नेकी को उसकी कमज़ोरी समझने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए, ऐसा करने के स्थान पर, उनसे कुछ सीख के व प्रेरणा ले के हमें स्वयं भी कुछ अच्छा करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से हमे सुखद अनुभूति होगी और हम स्वयं से प्रसन्न रहने लगेंगे।
कभी भी किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान की शरण न लीजिए। यह सब तो आज हैं जाने कल हों न हों। सिर्फ प्रभु शरण आ कर ही हम स्थाई, स्थिर व सम्पूर्ण तृप्ति का दान प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर ही ढूढ़ सन्तोष व अचल शांति के एक मात्र स्त्रोत हैं। यहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई भेद-भाव नहीं, यह तो अटूट विश्वास व आस्था से बंधी आत्मा और परमात्मा की अलौकिक डोर है, यहाँ जो कोई आता है वह अपनी उम्मीदों और अनुमान से कई गुना अधिक ही पाता है।
मन को निश्चल, ह्रदय को निर्मल, बुद्धि को पावन और आत्मा को परमात्मा का अंश जान कर ही किसी दैवीय गतिविधी या यात्रा का आरंभ करना चाहिए। ऐसे पवित्र प्रयास से ही हम दैविक स्थानों के दर्शन योग्य बनते हैं और धार्मिक कार्यों से प्राप्त होने वाले ईश्वरीय अनुकम्पा के लायक होते हैं, अन्यथा हमारे सभी प्रयत्न औपचारिकता मात्र ही हो के रह जाते हैं और इनकी मूल दिव्यता और आलौकिक मर्म कहीं सांसारिकता में लुप्त हो जाते हैं।
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