
यह दुनिया तो पल-पल बदलती ही रहती है। यहाँ लोगों का आना-जाना तो नित लगा ही रहता है। इसीलिए, चाहे किसी की भी नज़रों में गिरना पर कभी भी अपनी नज़रों में न गिरना, क्योंकि, हम हमेशा ही अपने साथ रहते हैं और अपने कर्मों का हिसाब- किताब हमे अकेले ही चुकाना होता है न की किसी अन्य को।
अपनी त्रुटि सहजता से स्वीकार करना और विनम्रतापूर्वक क्षमा मांग लेना हमारे बड़प्पन और उदारता का प्रमाण होता है न की हमारे किसी खोट या दोष का। ऐसा करने से हमारा मन तो हल्का होता ही है, दूसरों के लिए एक नेक उदाहरण स्थापित होता है और साथ ही साथ हम सबके आदर व सम्मान के योग्य पात्र भी सिद्ध होते हैं।
प्रकृति जिन पंचमहाभूत से निर्मित है हम भी उसी पंचतत्व से बने हैं। जब हम प्रकृति को नष्ट करते हैं तब हम अपने ही विनाश की ओर तीव्रता से बढ़ते हैं। प्रकृति का विध्वंस सम्पूर्ण मानव जाति व सभ्यता के लिए न सिर्फ घातक है बल्कि इसके पीड़ादायक व दुखदाई अंत की शुरुआत है। इसलिए, प्रकृति की रक्षा व संरक्षण प्रकृति के लिए नहीं तो न सही हमे अपने हित के लिए तो करनी ही चाहिए।
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