सम्वाद

आध्यात्म की अभिव्यक्ति हमारे विचारों, वाणी व व्यवहार से होती है, न की सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों व व्रत-उपवासों से। विचारों में स्पष्टता, वाणी में विनम्रता, व्यवहार में सहजता और जीवन में सरलता ही आध्यात्म की वास्तविक उपयोगिता होती है और सार्थक ईश्वरिय साधना। हमारा जीवन ही एक मंदिर है और जीने की कला हमारी पूजा सामग्री व पद्धति। जीवन ही एक तीर्थ है और जीना यात्रा!

जब कभी भी सोचने से समस्या सुलझने की जगह उलझती ही चली जाए, तब ऐसी स्थिति में समस्या को ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। जब भी हम प्रभु की कृपा व न्याय पर अटूट विश्वास व भरोसे से जटिल से जटिल समस्या को ईश्वर को सौंप देते हैं बस तब ही से हम स्वयं को बोझ मुक्त व निर्भार अनुभव करने लगते हैं। यह एक व्यवहारिक प्रयास व आध्यात्मिक अभ्यास है, और तो और इसके परिणाम भी अचूक व चमत्कारी होते हैं!

एक ऐसा भी स्थान है जो की कर्मो के हिसाब-किताब और कार्यों के सवाल-जवाब के परे है और संसार में रहते हुए भी हम वहाँ पहुंच सकते हैं। ईश्वरिय स्मरण के वाहन पर सवार हो कर हम इस मुक्त व स्वतंत्र गंतव्य को प्राप्त कर सकते हैं । ईश्वर को पावन मन और निश्चल भाव से याद करना ही अपने इस वांछित लक्ष्य तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग है। जब हम अपनी पूरी क्षमता व शक्ति से प्रभु की स्मृति में लीन हो जाते हैं तब हम एक अद्भुत पवित्रता, असीम शांति और अलौकिक प्रकाश का अविस्मरणीय अनुभव करते हैं।

Leave a comment