वार्ता

जब हम अपनी सीमाओं के पार जाते हैं, तब ही हम ईश्वर के द्वार तक पहुंचते पाते हैं। स्वंय को स्वंय से मुक्त कर के ही हम दिव्य मुक्ती के मार्ग पर प्रथम पग रख पाते हैं।

हम जब अपना सत्य, अपने आस-पास के अन्यों का सत्य, अपनी परिस्थितियों का सत्य पहचानने लग जाते हैं तब धीरे-धीरे हम परम सत्य की ओर बढ़ने लग जाते हैं, अपने परम जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर हो पाते हैं।

ईश्वर की सफल अराधना तब होती है जब हम ईश्वरिय भाव और तत्व से अपने कण-कण को ओत-प्रोत कर लेते हैं, अपने क्षण-क्षण में उसे जीते हैं, अपने आचरण व जीवन में उसे उतारते हैं, और इस प्रकार के अनुसरण से हम ईश्वर की सच्ची साधना में कामयाब हो पाते हैं।

जब हम प्रभु के चरणों में अपनी हर समस्या, कष्ट, दुख-दर्द, अर्पित कर के स्वयं अंतर्तम से भार मुक्त व निश्चिंत हो जाते हैं तब हम भक्ति व श्रद्धा के ही एक रूप का अभ्यास करते हैं। सच्चे अश्रुओं से बढ़ कर प्रभु के चरणों के लिए और कोई उपयुक्त व पवित्र चढ़ावा नहीं।

हम सब अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे। अपना-अपना भाग्य हमे स्वंय ही भोगना है, भुगतना है। हमारे हर सुख-दुख में भले ही कोई साथ हो न हो भगवान तो हमेशा ही हमारे साथ होते हैं, वे ही हमारे सच्चे और शाश्वत मित्र हैं, वे हमे कभी नहीं त्यागते। उनका अटूट आशीर्वाद व स्थाई स्नेह किसी न किसी रूप में हमेशा ही हमारे साथ होते है।

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