मोती-मनके

सत्य की अग्नि में जल कर ही सोना कुन्दन बनता है, सत्य की आँच में तप कर ही कोयला हीरा बन निखरता है, सत्य के सागर से हो कर ही सीप से मोती निकलता है, सत्य की रेत में दब कर ही पत्थर मणी-मनकों का रूप ले उभरता हैं। सत्य की उपासना करें, सत्य को धारण करें, भले ही मार्ग में पग पर कितने ही कांटे क्यों न चुभें, क्योकि, इस पथ के कांटे भी फूल हैं और आंसू अमृत।

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