सफ़रनामा

जीवन एक सफ़र है, इधर पल दो पल की होती हर रहगुज़र है, यहाँ कहीं सवेरा तो होती कहीं सहर है।

इस सफ़र का एक ही तो दस्तूर है, की हर गुज़रते पड़ाव से हमे कुछ न कुछ सीखना ज़रूर है, क्योंकि, जैसे आय थे वैसे ही लौट जाना तो एक अनचाहा कसूर है।

हमारे यहाँ होने का कुछ तो मकसद है, यह आने-जाने का सिलसिला सिर्फ जब तक है, होते नहीं हिसाब-किताब तमाम सारे यह सिर्फ तब तक है।

जैसे-जैसे हम सीखते और बदलते जाएंगे, वैसे-वैसे हम अपनी मंज़िल के करीब पहुंचते चले आएंगे।

यूंही पूरे कर अपने सभी सबक, जब हम लेंगे सब से अपनी आखरी रुख़सत, तब न रहेगी हमारे मन में कोई अधूरी कसक, गिले, शिकवे या फ़िर शिकायत।

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