धूप छाँव

दुख की धूप में ही तप कर सोना कुन्दन है बनता,

सुख की छाँव में तो कभी कुछ भी नहीं है बदलता,

विपदाओं व चुनौतियों में ही बहुत कुछ सीखने को हमे है मिलता,

और यूं ही तो हमारी आत्मा का यह फूल है खिलता।

इस दुख की धूप में ही तो आत्मा का दीप है जलता,

सुख की छाँव में थोड़ी न यह दीप कभी भी है चमकता,

और जो एक बार यह सूरज है निकलता, तो फिर यह दोबारा कभी नहीं है ढलता।

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