आमना-सामना

जीवन में जब भी कोई चुनौती हमसे रूबरू होती है तब बस इतनी सी बात समझ लेनी चाहिए की शायद अब वह घड़ी आ गई है जब हमारा खुद से खुद का सामना होना है। हर समस्या हमारी कमज़ोरियों से हमे परिचित करवाती है। हर नई उलझन हमे हमारी सीमा दिखाती है। ऐसे ही मुश्किल से मुश्किल हालात का हम तभी मुकाबला कर सकते हैं जब हम अपनी इन सीमाओं के पार जाएं। और जैसे-जैसे हम अपनी सीमाओं पर जीत हासिल करते जाते हैं, उन पर विजय प्राप्त कर उनको पीछे छोड़े जाते हैं, वैसे-वैसे ही हम ईश्वर के निकट से निकटतम पहुंचते जाते हैं, क्योंकि, जब हम साहस व हिम्मत से हालातों का मुकाबला करने के लिए पहला कदम उठाते हैं बस उसी क्षण प्रभु हमारी ओर दोगुने कदम बढ़ाते हैं। जब हम हर कठिन से कठिन व अप्रत्याशित परिस्थिति का सामना करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तब न सिर्फ हमारी मुलाकात अपनेआप से होती है, वरन, हमारे ही भीतर विद्यमान ईश्वर से भी हमारी पहचान होने लगती है, जिन्हें हम दुनियादारी और संसारिक्ता के कुचक्र में फ़ंस कर कहीं भुलाए बैठे हैं। हर कठिनाई वास्तव में आती ही है हमारा हमारे परमपिता से पुनः मिलन कराने के लिए। इसीलिए, हर परिस्थिति में हमे ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए और आज से, अभी से, हमे खुद से यह वादा करना चाहिए की, ज़िंदगी में हर चुनौति को सदैव ही हम एक स्व-निर्माण के अवसर में परिवर्तित कर आगे चलते -चलेंगे, बढ़ते- बढ़ेंगे।

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