
जब-जब हम ज़रूरतमंदो की मदद के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाते हैं, असल में तब- तब, हम उपर वाले की इबादत में ही अपने हाथ ऊपर उठाते हैं …….
अपनी हर कमज़ोरी, बुराई, निम्नता का त्याग करना ही प्रभु के चरणों के लिए सर्वश्रेष्ठ भेंट हैं, यही तो है वह बलिदान जो ईश्वर को लगता है अति मूल्यवान…..
ईश्वर की वास्तविक भक्ति तब होती है ,जब हम आज में, अभी में, जीते हैं, अपने सभी पूर्वाग्रहों व अनुमानों से मुक्त हो के ही हम प्रभु का सच्चा अनुभव कर पाते हैं, और यूंही भन में एक दिव्य ज्योति प्रज्वलित होती है ……..
कहते हैं, जो लोग ज़्यादा डरते हैं, वह ईश्वर में विश्वास कुछ कम रखते हैं ……..
जब खुद से खुद की हुई रिहाई, तब कहीं जा के रूहानी पनाह पाई ………
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