
रिश्तों का यह जो ताना-बाना है, जन्मों का यह तो बंधन पुराना है,
यूंही नहीं किसी का आना और किसी का जाना है,
कोई अपना अनजाना, तो कोई बेगाना जाना-पहचाना है,
किसी का दो कदम चल के छूट जाना है, और किसी का तो दूर तक साथ निभाना है,
जीवन के इस मेले में जहाँ कभी विरह, तो कभी मिलना-मिलाना है,
वहाँ एक ही तो अपना शाश्वत ठिकाना है, यहीं पर शीश झुकाना है, विश्वास का अमर दीप जलाना है,
क्योंकि, यही तो हैं वो, जो सदा ही हमारे साथ थे, हैं और सब के चले जाने के बाद भी इन्हीं को तो हमारे पास रह जाना है।
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