पलछिन

रातें इतनी लम्बी न हों की सवेरा होने न पाए,

फ़ासले इतने ज़्यादा न हों की कभी मिटने न पाए,

खाई इतनी गहरी न हो की फिर भरने न पाए,

दूरी इतनी न हो की किनारे कहीं मिलने न पाए,

वक्त इतना लम्बा न हो की कभी मुड़ने न पाए,

जान के अनजान इतना न बनें की कभी फिर जान-पहचान होने न पाए,

……..इसीलिए, आओ, आज दोस्ती का हाथ बढ़ाए, सबसे मिले-मिलाए

सबका साथ निभाए, एक-दूसरे का हाथ बटाए वरना, कहीं यूं न हो, की फिर अफसोस इतना हो की जन्मों सहने न पाए………

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