-
वार्ता

जब हम अपनी सीमाओं के पार जाते हैं, तब ही हम ईश्वर के द्वार तक पहुंचते पाते हैं। स्वंय को स्वंय से मुक्त कर के ही हम दिव्य मुक्ती के मार्ग पर प्रथम पग रख पाते हैं।
हम जब अपना सत्य, अपने आस-पास के अन्यों का सत्य, अपनी परिस्थितियों का सत्य पहचानने लग जाते हैं तब धीरे-धीरे हम परम सत्य की ओर बढ़ने लग जाते हैं, अपने परम जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर हो पाते हैं।
ईश्वर की सफल अराधना तब होती है जब हम ईश्वरिय भाव और तत्व से अपने कण-कण को ओत-प्रोत कर लेते हैं, अपने क्षण-क्षण में उसे जीते हैं, अपने आचरण व जीवन में उसे उतारते हैं, और इस प्रकार के अनुसरण से हम ईश्वर की सच्ची साधना में कामयाब हो पाते हैं।
जब हम प्रभु के चरणों में अपनी हर समस्या, कष्ट, दुख-दर्द, अर्पित कर के स्वयं अंतर्तम से भार मुक्त व निश्चिंत हो जाते हैं तब हम भक्ति व श्रद्धा के ही एक रूप का अभ्यास करते हैं। सच्चे अश्रुओं से बढ़ कर प्रभु के चरणों के लिए और कोई उपयुक्त व पवित्र चढ़ावा नहीं।
हम सब अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे। अपना-अपना भाग्य हमे स्वंय ही भोगना है, भुगतना है। हमारे हर सुख-दुख में भले ही कोई साथ हो न हो भगवान तो हमेशा ही हमारे साथ होते हैं, वे ही हमारे सच्चे और शाश्वत मित्र हैं, वे हमे कभी नहीं त्यागते। उनका अटूट आशीर्वाद व स्थाई स्नेह किसी न किसी रूप में हमेशा ही हमारे साथ होते है।
-
Meanderings……

Practice giving more……tangible, intangible…….experience getting more.
Make someone’s day……. meet and greet…… smile and shine…….life’s short and time flies.
Do not take anyone for granted…….no one’s there forever……share more care more…… while there’s still time.
Just be…..sometimes be by yourself…….being solitary helps……calm the mind…… answers to questions……..solutions to problems…….manifests themselves.
Spirituality…….don’t just materialise…….internalize……let the Divine Essence seep in…….immerse and purify…….get the Spirit……light the lamp within.
-
बातों – बातों में

…….जो बोल बोल गए उनका बहुत मोल है, और जो लफ्ज़ लबों पे ठहर गए वह अनमोल है……
……. जो आंसू आँखों से छलक गए वह बहुमूल्य हैं, और जो आंसू आँखों में तैरते रह गए वह अमूल्य हैं…….
…….जो सदा लबों पे आ गई वह दवा है, और जो आह दिल में रह गई वह दुआ है …….
…….जो कुछ कह गए वह हद है, और जो सब सह गए वह बेहद है…….
……..जो चल रही सांसे हैं उनका तो कहीं अंत है, और जो आकाश है वह अमर और अनंत है ……
-
सम्वाद

आध्यात्म की अभिव्यक्ति हमारे विचारों, वाणी व व्यवहार से होती है, न की सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों व व्रत-उपवासों से। विचारों में स्पष्टता, वाणी में विनम्रता, व्यवहार में सहजता और जीवन में सरलता ही आध्यात्म की वास्तविक उपयोगिता होती है और सार्थक ईश्वरिय साधना। हमारा जीवन ही एक मंदिर है और जीने की कला हमारी पूजा सामग्री व पद्धति। जीवन ही एक तीर्थ है और जीना यात्रा!
जब कभी भी सोचने से समस्या सुलझने की जगह उलझती ही चली जाए, तब ऐसी स्थिति में समस्या को ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। जब भी हम प्रभु की कृपा व न्याय पर अटूट विश्वास व भरोसे से जटिल से जटिल समस्या को ईश्वर को सौंप देते हैं बस तब ही से हम स्वयं को बोझ मुक्त व निर्भार अनुभव करने लगते हैं। यह एक व्यवहारिक प्रयास व आध्यात्मिक अभ्यास है, और तो और इसके परिणाम भी अचूक व चमत्कारी होते हैं!
एक ऐसा भी स्थान है जो की कर्मो के हिसाब-किताब और कार्यों के सवाल-जवाब के परे है और संसार में रहते हुए भी हम वहाँ पहुंच सकते हैं। ईश्वरिय स्मरण के वाहन पर सवार हो कर हम इस मुक्त व स्वतंत्र गंतव्य को प्राप्त कर सकते हैं । ईश्वर को पावन मन और निश्चल भाव से याद करना ही अपने इस वांछित लक्ष्य तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग है। जब हम अपनी पूरी क्षमता व शक्ति से प्रभु की स्मृति में लीन हो जाते हैं तब हम एक अद्भुत पवित्रता, असीम शांति और अलौकिक प्रकाश का अविस्मरणीय अनुभव करते हैं।
-
सागर संगीत

बोतल पूरी भरी है या खाली दूर से एक समान ही दिखती है। लेकिन जब ठोकर लगती है तब खाली बोतल लड़खड़ा के बिखर जाती है और भरी हुई बोतल सम्भल के निखर जाती है।
मन जब-जब भटक जाए तब-तब इसको सांसों की डोर से बांध लेना चाहिए, धीर-धीर मन स्थिर व शांत होने लग जाएगा। हर आती हुई सांस के साथ नई ऊर्जा व सकारात्मकता आएगी और जाती हुई सांस अपने साथ उदासी व नकारात्मकता ले जाएगी।
स्वरों के सागर में डूब के ही ज़िंदगी के सुर तलाशने हैं, ताल कभी भी रुकती नहीं है और अगर कहीं गलती से हम रुक गए तो फिर जीवन संगीत बेसुरा हो जाता है, इसीलिए, जीवन की सुर, ताल व लय बनाए रखने के लिए हमेशा ही चलते रहें, बढ़ते रहें।
जब कभी भी निराशा के बादल घिरने लगें तब सिर्फ इतनी सी बात याद रखने वाली होती है की इंसान तो भले ही बदल सकते हैं मगर ईश्वर न ही कभी बदले हैं और न ही कभी भी बदलेंगे, वे हमारे सच्चे मित्र व परमपिता हैं और हमेशा ही हमारे साथ रहेंगे, प्रभु के घर में भले ही देर हो सकती है मगर अंधेर नहीं।
-
ठण्डी छांव

जो है हर क्षण प्रभु के प्रभाव में, न रहने देते हैं वे उसे किसी भी अभाव में,
जिसकी ज़िन्दगी गुज़रती है ईश्वर से लगाव में, वह न टूटता है दुनिया के दबाव में,
हर एक जो रहता है अपने सच्चे स्वभाव में, वह न बिखरता है लोगों के तनाव में,
जब भगवन स्व्यं खड़े हैं हमारे बचाव में, तो फिर कैसे आएंगे हम अन्यों के झुकाव में?
मनुष्य जन्म सार्थक वही है जो रहे तो संसार में, पर जीवन हो व्यतीत प्रभु प्रेम की ठण्डी छांव में।
-
पल दो पल

फ़ासले इतने न बढ़ें की कभी मिटने न पाएं, खाइयां इतनी गहरी न हो की कभी भरने न पाएं,
रातें इतनी काली न हों की कभी सवेरा होने न पाए, बादल इतने घनेरे न हो की कभी छटने न पाएं,
शामें इतनी लम्बी न हों की कभी ढलने न पाएं, पहाड़ियां इतनी हठी न हों की कभी हटने न पाएं,
ज़िंदगी पल दो पल की है, दूरियां इतनी न हों की कभी फिर मिलने न पाएं,
चलो आज एक दसरे की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएं, गिले-शिकवे सभी भुलाएं, यह ज़िन्दगानी का सफ़र हँसी-खुशी साथ बिताएं।
-
कहानी नई पुरानी

समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। परिवर्तन जीवन का एक स्थाई स्तंभ है। इसे न कोई रोक पाया है और न ही कभी रोक पायेगा। हर परिवर्तन को आत्मसात कर लेने से जीवन खुशियों से भर जाता है। इसका विरोध करने से और स्वयं में ही बांध लेने का प्रयत्न करने से यह विष बन हमे ही अंदर से खोखला कर जाता है। परिवर्तन की अभिव्यक्ति तो समय और प्रकृति के साथ होनी ही होनी है। हर परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करने से हमारा जीवन सुखद व प्रगतिशील बनता है, वहीं इसका विरोध करने से, इसके मार्ग में बाधा बनने से दुखद व पीड़ादायक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। हर दिन एक नया दिन है हर पल एक नया पल है। जो आज है वह कल नहीं, जो कल था वह आज नहीं और जो आने वाला कल है वह किसी ने देखा नहीं। हर परिवर्तन का स्वागत करिये, अपना जीवन चक्र पूर्ण करिए।
-
चलते चलो

जहाँ मिलेगा सहने को न फिर रहेगा वहाँ कुछ भी कहने को, ठहरे हुए पानी को बस वहीं रहने दो, जीवन को एक नया रुख लेने दो, ज़िंदगी के सफ़र को न ही कहीं भी थमने दो, यह तो नदिया है इसे उन्मुक्त बहने दो, जो दूर कहीं पीछे रह गए उनको सिर्फ दुआएं दो और यूंही, बढ़ते बढ़ो……. बस चलते चलो ……..
-
सागर संगम

जीवन में द्वंद परिवर्तन से नहीं बल्कि परिवर्तन के विरोध से होता है, चाहे वह परिवर्तन किसी भी प्रकार का ही क्यों न हो। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। इसीलिए, विचारों में लचीलापन लाएं और परिवर्तन को सहजता से स्वीकारें। जीवन को बासी होने से बचाएं, परिवर्तन की हवाओं के साथ उड़ते रहें, इस नदिया के साथ बहते रहें, जीवन में ताज़गी और बहार बनाए रखें।
हम सबसे भाग सकते हैं, सभी से झूठ कह सकते हैं, परंतु खुद से कहाॅ भागेंगे, स्वंय से सत्य कैसे छिपाएंगे? इसीलिए, मन साफ़ रखें, मन हल्का रखें। जानते-बूझते कभी कुछ गलत न करें , न ही कभी किसी असत्य का साथ दें, कभी छोटे रस्ते से बच के निकलने की कोशिश न करें, क्योंकि ऐसा करने से हम अपने दुख-दर्द दोगुना बढ़ा लेते हैं। अपनी अंतरआत्मा की पुकार सुने,हर परिस्थिति का डट कर, साहस से, ईश्वर पर विश्वास रखते हुए शुद्ध भावना से सामना करें।
एक बच्चे को यह दुनिया बिल्कुल नई जान पड़ती है, एक युवा के लिए यही दुनिया सम्भावनाओं से भरी पड़ी है। किसी मध्यवय व्यक्ति के लिए यह उपलब्धियों का अम्बार है, तो वहीं किसी बुज़ुर्ग के लिए जानी-पहचानी व यादों और अनुभवों का खज़ाना है। बचपन, यौवन, मध्यवय, वृद्धावस्था हर एक के जीवन का हिस्सा है। अपने-अपने समय से हर एक को इससे हो के गुज़रना है। परन्तु इस लोक का सौंदर्य यह भी है की,एक ही समय में यहाँ कोई बच्चा है तो कोई वृद्ध, और एक ही वक्त में हर एक अपनी -अपनी अवस्था व परिस्थिति के ऐनक से इस जगत को देख रहा है, टटोल रहा है, अनुभव कर रहा है। यही तो इस जग की खूबी है, खासियत है, की एक ही पल में एक और अनेक यहाँ साथ-साथ बसर करते हैं।